Description
इस पुस्तक को पढ़ने से पाठकों को स्वयं अनुभव होगा कि उनकी शब्दावली में वृद्धि हो रही है और वे विधि तथा समाज से संबंधित विभिन्न विषयों पर समझने और लिखने में सक्षम हो रहे हैं। विभिन्न विषयों तथा विधिक शब्दों से संबंधित निबंध भाग पर विशेष बल दिया गया है।
विधि के छात्रों तथा सामान्य जन की वास्तविक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए—जो विधिक भाषा को समझना चाहते हैं—लेखक ने विधि अध्ययन के तीन वर्षीय एवं पाँच वर्षीय एल.एल.बी. पाठ्यक्रमों में प्रयुक्त होने वाली लैटिन शब्दावली को सरलता से समझाने का प्रयास किया है, जो विभिन्न विधिक विषयों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।
यह सर्वविदित तथ्य है कि एक नए अधिवक्ता को विभिन्न समस्याओं से संबंधित आवेदन, पत्र तथा शिकायतों का मसौदा तैयार करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न विषयों और मुद्दों से संबंधित कई उदाहरण शामिल किए गए हैं, ताकि पाठकों को विभिन्न परिस्थितियों में दस्तावेज़ों के प्रारूपण (ड्राफ्टिंग) में सहायता मिल सके। प्रारूपण और पत्र लेखन से संबंधित अध्याय इन समस्याओं के समाधान में सहायक सिद्ध होंगे।
विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाले अभ्यर्थियों के लिए, जो सामान्य अंग्रेज़ी प्रश्नपत्र की तैयारी के लिए सामग्री खोजते हैं, यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। इसमें वन-वर्ड सब्स्टीट्यूशन, विधिक भ्रांतियाँ (लीगल फॉलैसीज़), सामान्य त्रुटियाँ, शब्द-युग्म, अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद, प्रेसी लेखन, विलोम तथा पर्यायवाची शब्द आदि विषयों को सम्मिलित किया गया है।
इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों का अनुवाद भी पुस्तक के अंत में दिया गया है, जो विभिन्न परीक्षाओं में पूछे जा चुके हैं। छात्रों की सुविधा के लिए अध्याय 11 में अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में अनेक विधिक शब्दों का संकलन प्रस्तुत किया गया है।
\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\"छह दशकों से अधिक समय से, न्यायमूर्ति आर.के. अग्रवाल की \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\"\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\"हिंदू लॉ\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\"\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\" (Hindu Law) पूरे भारत में कानून के छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए एक अनिवार्य संसाधन रही है। पहली बार 1958 में प्रकाशित यह पुस्तक अब अपने पूरी तरह से अद्यतन 27वें संस्करण में है, जो इसकी स्थायी प्रासंगिकता और लोकप्रियता का प्रमाण है।
छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई यह पाठ्यपुस्तक सरल, स्पष्ट और गैर-तकनीकी भाषा में लिखी गई है, ताकि बुनियादी कानूनी सिद्धांतों की स्पष्ट समझ सुनिश्चित हो सके और रटने की आवश्यकता न पड़े।
प्रमुख विशेषताएं और संरचना:
अधिनियमित कानून (Enacted Laws): पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन क्रांतिकारी कानूनों के केंद्रित अध्ययन के लिए समर्पित है जिन्होंने हिंदू कानून को बदल दिया:
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956
हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956
तुलनात्मक विश्लेषण: इस पुस्तक की एक मुख्य विशेषता इन अधिनियमों से पहले और बाद के कानून का तुलनात्मक विश्लेषण है, जिसे उदाहरणों और रेखाचित्रों के माध्यम से समझाया गया है।
27वां संस्करण और अद्यतन: डॉ. एच.एच. सिंह द्वारा संशोधित इस संस्करण में माननीय उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के सभी प्रमुख और हालिया निर्णयों को शामिल किया गया है।
महत्वपूर्ण विधायी परिवर्तन: यह व्यक्तिगत कानून (संशोधन) अधिनियम, 2019 के प्रभाव को दर्शाता है, जिसने कुष्ठ रोग (leprosy) को न्यायिक पृथक्करण/तलाक और अलग भरण-पोषण के आधार के रूप में हटा दिया है।
छात्रों द्वारा भरोसेमंद और शिक्षक बिरादरी द्वारा प्रशंसित यह व्यापक मार्गदर्शिका हिंदू कानून का अध्ययन करने या उसे लागू करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए आज भी उतनी ही आवश्यक बनी हुई है।\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\"
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